झारखंड का दलित चेहरा बना ओडिशा का राज्यपाल, जानें कौन हैं ब्रज मोहन राम?

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने झारखंड के दलित चेहरे ब्रज मोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाया. ब्रज मोहन राम पलामू से तीन बार सांसद रह चुके हैं.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार (12 अक्टूबर) 6 राज्यों के राज्यपाल बदल दिए हैं. लिस्ट में झारखंड के पलामू से पूर्व सांसद ब्रज मोहन राम को ओडिशा का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से तीन बार सांसद रह चुके ब्रज मोहन राम हरि बाबू कंभमपति का स्थान लेंगे, जिन्होंने तीन जनवरी, 2025 को राज्यपाल का पदभार संभाला था.
राष्ट्रपति भवन की ओर से 12 अक्टूबर को जारी अधिसूचना में उनकी नियुक्ति की घोषणा की गई. एक जनवरी 1958 को तत्कालीन बिहार के पलामू जिले के चंदवा में जन्मे ब्रज मोहन राम का लंबा राजनीतिक अनुभव रहा है. चंदवा अब झारखंड के लातेहार जिले में आता है. उनके पिता का नाम अर्जुन राम बैठा और माता का नाम चैती देवी है. ब्रज मोहन झारखंड का एक दलित चेहरा हैं.
कौन हैं ओडिशा के नए राज्यपाल ब्रज मोहन राम?
ब्रज मोहन राम रांची विश्वविद्यालय से संबद्ध बीएस कॉलेज, लोहरदगा से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की. ब्रज मोहन राम ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत अविभाजित बिहार से की. वह 1991 से 1995 तक बिहार विधानसभा के सदस्य रहे.
इसके बाद उन्होंने पलामू संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा और लगातार तीन बार जीत हासिल की. वह 1996 से 1998 तक 11वीं लोकसभा, 1998 से 1999 तक 12वीं लोकसभा और 1999 से 2004 तक 13वीं लोकसभा के सदस्य रहे.
संसदीय कार्यकाल में निभाईं अहम जिम्मेदारियां
अपने संसदीय कार्यकाल के दौरान ब्रज मोहन राम ने ऊर्जा, रेलवे, परिवहन और पर्यटन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से संबंधित संसदीय समितियों में जिम्मेदारी निभाई. वह कोयला मंत्रालय की सलाहकार समिति तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण से संबंधित संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे. संसद में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने विभिन्न नीतिगत और जनहित से जुड़े विषयों पर काम किया. संगठनात्मक स्तर पर भी ब्रज मोहन राम बीजेपी में सक्रिय रहे हैं.
ब्रज मोहन राम ने झारखंड प्रदेश बीजेपी के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश प्रभारी सहित विभिन्न जिम्मेदारियां संभाली हैं. ओडिशा के राज्यपाल के रूप में उनकी नियुक्ति से झारखंड के राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है. पलामू का प्रतिनिधित्व कर चुके एक वरिष्ठ नेता को संवैधानिक पद की जिम्मेदारी मिलना राज्य के राजनीतिक परिदृश्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.





